कवि तुलसीदास के दोहे

कवि तुलसीदास के 15 प्रसिद्द दोहे अर्थ सहित | Tulsidas Ke Dohe In Hindi

महान कवि गोस्वामी तुलसीदास के बारे में आपने जरूर सुना होगा. तुलसीदास के दोहे इतने प्रचलित और सार्थक हैं की हर कोई उन्हें पसंद करता है. आज की हमारी पोस्ट Tulsidas Ke Dohe In Hindi में हम आपके लिए उनके 15 Top Best दोहे लेकर आये हैं. यहाँ हम आपको उनके हर दोहे का अर्थ यानी मतलब भी समझायेंगे.

तुलसीदास जी को भगवान् राम की भक्ति और उनके प्रति प्रेम के लिए जानना जाता है. उन्होंने अपने जीवनकाल में कई महान रचनाएँ पेश की. “रामचरितमानस” के रचियता श्री गोस्वामी तुलसीदास ही थे. उन्हें विश्व साहित्य के सबसे महान कवियों में से एक माना जाता है. कह सकते हैं की सारा संसार उनकी प्रतिभा का कायल रहा है.

उनकी महान रचनाओं में “गीतावली” “रामलला नहछू” वैराग्य संदीपनी” और हनुमान बाहुक” वगैरह शामिल हैं. जिन्होंने पूरे विश्व में अपनी चमक बिखेरी. इनका जन्म राजपुर का माना जाता है और इनके पिता का नाम श्रीधर बताया जाता रहा है. लेकिन इनके परिवार के बारे में हमारे पास इतनी ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है.

तुलसीदास जी के दोहे इतने Meaningful हैं की कोई भी व्यक्ति इनका अनुसरण करके अपना जीवन सुधार सकता है और एक सफल व्यक्ति बन सकता है. उन्होंने हमेशा अपनी रचनाओ से लोगों को एक नयी राह दिखने की कोशिश की. आज भी उनके जन्म काल को लेकर कई तरह के विवाद हैं, मतलब स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है.

एक महान लेखक और कवि बनने से पहले उनका नाम “तुलसीराम” था. कहते हैं उनका अपनी पत्नी के साथ झगडा रहता था. इसी वजह से उनकी पत्नी अपने मायके गयी हुयी थी. एक बार तुलसीदास जी को अपनी पत्नी की याद आई और वो सीधा यमुना नदी पार करके उसके गाँव पहुँच गए.

जब वो वहां पहुंचे उस वक़्त अँधेरी रात थी और मौसम खराब था. फिर भी तुलसी जी सीधा अपनी पत्नी रत्नावली के कमरे में जा पहुंचे. उन्हें अचानक इस भयानक रात में आया देख उनकी पत्नी घबरा गयी. तुलसीदास ने उन्हें अपने साथ चलने को कहा. लेकिन उनकी पत्नी ने इसके लिए हामी नहीं भरी.

उल्टा उनसे नाराज़ होते होते हुए कहा की तुम यहाँ क्यों आये हो? वापिस चले जाओ. जब तुलसी जी ज्यादा आग्रह करने लगे तो उनकी पत्नी ने एक दोहे के माध्यम से उनको समझाया की मेरे शरीर से इतना प्रेम, यह तो एक दिन पूरी तरह से नष्ट होकर मिटटी में मिल जाएगा.

अगर अपना जीवन सफल बनाना चाहते हो तो शरीर का मोह छोड़कर भगवान् राम की भक्ति में लीन हो जाओ. इससे आप इस भवसागर से पार हो जाओगे. कहते हैं उनकी इस बात ने तुलसीदास जी के मन को झकझोर कर रख दिया और वो पूरी तरह से राम के भक्त बन गए.

उसके बाद उन्होंने कई रचनाएँ लिखीं. जो की विश्व पटल पर अपनी एक अलग ही छाप छोड़ गयीं. चलिए अब वक़्त आ गया है उनके कुछ सबसे अच्छे और प्रसिद्द दोहे जानने का. हम यहाँ साथ साथ आपको उनके दोहों का अर्थ भी बताते चलेंगे.

तुलसीदास के दोहे और उनका मतलब – Tulsidas Ke Dohe In Hindi

वैसे तो तुलसीदास जी की रचनाएं अनेकों हैं. इसी तरह से उनके द्वारा लिखे गए दोहों की संख्या भी कम नहीं है. लेकिन हम यहाँ तुलसीदास जी के Top Best 15 दोहे आपके लिए लेकर आये हैं जो हमें व्यक्तिगत तौर पर बहुत पसंद हैं. तो चलिए शुरू करते हैं.

(1)                       “करम प्रधान विस्व करि राखा,

                             जो जस करई सो तस फलु चाखा”

इसका मतलब है की भगवान् “कर्म” को बहुत ही महत्वपूर्ण मानते हैं. इस दुनिया में जो जैसा कर्म करेगा, उसे वैसा ही फल मिलेगा. मतलब जैसी करनी, वैसी भरनी.

(2)                      सरनागत कहूँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि,

                             ते नर पॉवर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि”

इसका अर्थ ये हैं की जो व्यक्ति खुद को होने वाली हानि या अहित का अनुमान लगाकर खुद की शरण में आये हुए व्यक्ति को त्याग देते हैं वो पापमय होते हैं. ऐसे लोगों को देखना तक नहीं चाहिए.

(3)                     “मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक

                            पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक”

यहाँ तुलसीदास जी के कहने का मतलब है की जो मुखिया होता है उसे मुख यानी “मुहं” की तरह होना चाहिए. जो खाता पीता तो अकेला ही है पर विनम्र रहते हुए शरीर के सभी अंगों का पालन पोषण करता है.

(4)                    “तुलसी मीठे बचन  ते सुख उपजत चहुँ ओर

                            बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर”

इसका अर्थ है की मीठे बोल चारों और सुख फैलाते हैं. ये किसी को भी वश में करने का मन्त्र हैं. इन्सान को कडवे वचन त्यागकर मीठे बोल बोलने चाहिए.

(5)                    “आगें कह मृदु वचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई,
                           जाकर चित अहिगत सम भाई, अस कुमित्र परिहरेहि भलाई”

इस तुलसीदास के दोहे का मतलब ये हैं की जो मित्र आपके सामने रहकर मीठा बोलता है. लेकिन मन ही मन आपके प्रति बुरा भाव और इर्ष्या रखता है, जिसका मन सर्प की चाल की तरह टेढ़ा हो,उसे छोड़ देने में ही भलाई है.

(6)                     “रम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार तुलसी भीतर,

                             बाहेर हूँ जों चाहसि उजियार”

इसका मतलब है की हे मनुष्य यदि तुम बाहर और अन्दर दोनों तरह से उजियारा चाहते हो तो अपने मुखरूपी द्वार की जीभरूपी देहलीज पर हमेशा राम नाम की मनिदीप रखो.

(7)                     “नामु राम को कलपतरु कली कल्याण निवासु,

                             जो सिमरत भयो भांग ते तुलसी तुलसीदास”

इस दोहे का अर्थ है की राम का नाम इच्छित चीज़ देने वाला और मुक्ति का घर है. जिसको याद करने से भांग जैसा निकृष्ट तुलसी भी “तुलसीदास” हो गया है.

(8)                     “काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान,
                             तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान”

अर्थ – जब तक किसी भी इंसान का मन काम, लोभ, लालच और गुस्से के वश में रहता है, तब तक विद्वान और मुर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं रहता. These Are Amazing Tulsidas Ke Dohe In Hindi, जो इंसान का जीवन बदल सकते हैं.

(9)                       “तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक

                               साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक”

इसका मतलब है की किसी भी बड़ी मुसीबत से आपको ये सात गुण बचायेंगे. “शिक्षा, विनम्रता, बुद्धि, साहस, अच्छे कर्म, सच बोलने का गुण और भगवान् में विश्वास.

कवि तुलसीदास के दोहे

(10)                      “तुलसी देखि सुवेसु भूलहिं मूढ न चतुर नर
                              सुंदर के किहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि”

अर्थ – सुन्दर पहनावा देखकर सिर्फ मुर्ख व्यक्ति ही नहीं बल्कि बुद्धिमान इंसान भी धोखा खा जा जाते हैं. जिस प्रकार मोर दिखने में तो बहुत ही सुन्दर होता है पर उसका भोजन बहुत ही गन्दा होता है जैसे सांप, कीड़े, मकोड़े आदि.

(11)                        “तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए,
                                 अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए”

अर्थ – इस तुलसीदास के दोहे के अनुसार हम सबको भगवान् पर पूरा विश्वास रखते हुए बिना किसी डर के रहना चाहिए और किसी अनहोनी की आशंका नहीं रखनी चाहिए. अगर कुछ होना होगा तो वो होकर रहेगा. इसलिए बेकार की चिंता को छोड़कर ख़ुशी से रहना चाहिए.

(12)                        “तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग|

                                 सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग”

इसका मतलब है की इस संसार में अलग अलग तरह के लोग रहते हैं जिनका स्वभाव और व्यवहार अलग अलग है. लेकिन आप सबसे अच्छी तरह से मिलिए और बात कीजिये. जिस तरह से नाव की नदी के साथ मित्रता होती है जिससे वो नदी को आसानी से पार कर लेती है. वैसे ही आप भी अच्छे व्यवहार से ये भवसागर पार कर लेंगे.

(13)                         “सूर समर करनी करहि कहि न जनावहिं आपू,
                                  विद्यमान रन पाई रिपु कायर कथहिं प्रतापु”

अर्थ – जो वीर होते हैं वो युद्ध में वीरता दिखाते हैं, सिर्फ बोलकर जताते नहीं हैं. अपने दुश्मन को रणभूमि के उपस्थित पाकर कायर लोग ही डींगे हांकते हैं.

(14)

                                  “लसी पावस के समय, धरी कोकिलन मौन

                                    अब तो दादुर बोलिहं, हमें पूछिह कौन”

इसका मतलब है की बारिश के मौसम में मेंढकों के टर्राने की भद्दी आवाज़ इतनी तेज हो जाती है की कोयल की सुरीली आवाज़ दब जाती है. इसलिए कोयल चुप हो जाती है. यानी जब कपटी और धूर्त लोगों का बोलबाला हो जाता है तो बुद्धिमान व्यक्ति चुप हो जाता है और व्यर्थ ही अपनी उर्जा बर्बाद नहीं करता.

(15)                  “बड अधिकार दच्छ जब पावा।अति अभिमानु हृदय तब आबा,
                           नहि कोउ अस जनमा जग माहीं।प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं”

इस दोहे का अर्थ है की जब दक्ष को प्रजापति का अधिकार मिला तो उसके मन में बहुत ही ज्यादा अहंकार आ गया. संसार में ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ जिसको अधिकार पाकर घमंड नहीं हुआ.

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